बाल्मीकि रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती हर वर्ष आश्विन मास की शरद पूर्णिमा को मनाई जाती है। हिंदू धर्म में वाल्मीकि जयंती का बहुत महत्व है क्योंकि वाल्मीकि जी का संपूर्ण जीवन काल बदलावों से भरा हुआ है। उन्होंने रामायण जैसे महान ग्रंथ की रचना भी की है।उनके जीवन से हमें कुछ न कुछ सीखते रहने के लिए प्रेरणा मिलती है।जीवन को अच्छा और बेहतर बनाने की प्रेरणा मिलती है।
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| राम नाम की कठोर साधना में लीन डाकू रत्नाकर जो एक दिन महर्षि बन गया |
वाल्मीकि
जयंती पूरे भारत वर्ष में धूम-धाम से लोआ ग मनाते हैं।इस दिन जगह जगह
लोग रामायण का पाठ करते हैं और भंडारा का आयोजन कर लोगों को भोजन करवाते हैं। इतने
सारे लोगों के एक साथ आकर भोजन करने औऱ रामायण पाठ करने से यह दिवस सामाजिक सद्भाव
दिवस के रूप में भी लोगों के सामने दिखाई पड़ता है।उत्तर भारत में यह दिन बहुत
महत्व का दिन होता है।आइए वाल्मीकि जी के जीवन से जुड़ी कुछ बातों के बारे में
चर्चा को आगे बढ़ाते हैं...
पहले क्या था वाल्मीकि जी का असली नाम
यह
एक दिलचस्प प्रसंग है कि पहले वाल्मीकि जी का वास्तविक नाम रत्नाकर था। महर्षि से
पहले वे एक डाकू थे। उनका पालन पोषण उनके असली माता-पिता ने नहीं किया था क्योंकि
बचपन में उनको एक भील ने चुरा लिया था। भीलों का मुख्य कार्य लोगों से लूट-पाट
करके परिवार की आजीविका चलाना भर होता था। भील परिवार में लालन पोषण होने के कारण
वो भी एक डाकू बन गए।इस तरह वे लोगों में रत्नाकर डाकू के नाम से जाने गए।
नारद
मुनि जी के ज्ञान से उनके जीवन में बदलाव आया
एक
बार नारद मुनि उसी जंगल से गुजर रहे थे जिस जंगल में डाकू रत्नाकर लूट-पाट किया
करता था।नारद मुनि जी से डाकू रत्नाकर ने उनका पूरा सामान लूट लिया। नारद जी एकदम
शांत रहे और शांत भाव से ही उन्होंने डाकू रत्नाकर से बातचीत की । नारद जी ने
रत्नाकर से पूछा -'तुम
इतना नीच अपराध क्यों करते हो?' नारद जी की बात सुनकर डाकू रत्नाकर बोला कि मैं
अपने परिवार की आजीविका चलाने के लिए ऐसा करता हूँ।
डाकू
रत्नाकर का जवाब सुनकर नारद जी फिर उससे बोलते हैं कि जिस परिवार के लिए तुम ऐसा
नीच कार्य करते हो क्या वह परिवार इस कार्य में तुम्हारा साथ देगा। रत्नाकर ने
बहुत विश्वास के साथ कहा '
हां देगा वह मेरा परिवार है।' तब
नारद जी पुनः बोले कि जाओ और अपने परिवार की मंशा जानकर आओ कि इस कार्य में क्या
वह तुम्हारा साथ देगा?डाकू
रत्नाकर अपने परिवार के पास गया और सबसे पूछने लगा।उसके नीच और घृणित कार्यों में
साथ देने के लिए उसके परिवार का कोई भी सदस्य तैयार नहीं हुआ। परिवार के सदस्यों
की मंशा जानकर डाकू रत्नाकर अत्यंत दुखी हो उठा ।वह नारद मुनी के पास आकर अपने
अपराधों के लिए क्षमा मांगने लगा। इस घटना से डाकू रत्नाकर का मन बदल गया। नारद जी
से वह अपने पाप से मुक्ति का रास्ता पूछने लगा। उस समय नारद जी ने उन्हें राम राम
के नाम का निरन्तर जप करने को कहा। नारद जी की बात मानकर डाकू रत्नाकर का हृदय
परिवर्तन हुआ और वह राम राम का जप करने लगा।वह ध्यान में इतना बेसुध उठा था कि राम
राम के स्थान पर उसके मुख से मरा मरा शब्द निकलने लगे।
रामायण
की रचना और बाल्मीकि नाम ने उन्हें नया जीवन दिया
नारद
जी के ज्ञान उपरांत डाकू रत्नाकर ने कठोर तप किया इसका प्रसंग तो ग्रंथों में
मिलता ही है । तप के दौरान उनसे भूल यह हो गई कि वे राम नाम
जपने की बजाए (मरा,
मरा) जपने लगे थे।जैसा की विदित है , वह
पहले डाकू रत्नाकर था,
इसलिए उसमें चेतना की कमी थी । ऐसी लोक मान्यता है
कि बेसुधगी में भगवान राम का नाम उल्टा जपने के कारण उसकी देह के ऊपर दीमकों ने
अपनी बांबी बना ली।जो पाप डाकू होते हुए उसने किए थे,संभवतः
यह उसकी ही सजा थी।फिर भी रत्नाकर की तपस्या कभी भंग नहीं हुई।कहते हैं उसकी कठोर
तपस्या से खुश होकर ही ब्रह्मा जी ने उन्हें रामायण महाकाव्य लिखने की प्रेरणा दी।
उन्हें इतना सामर्थ्य वान बनाया कि रामायण जैसा महा ग्रंथ लिख कर उसी रत्नाकर ने
लोगों को उपकृत किया।दीमकों की बांबी को ही बाल्मीकि कहा जाता है,देह
पर दीमकों की बांबी चढ़ जाने के कारण ही उनका नाम रत्नाकर से बाल्मीकि पड़ा।रामायण
की रचना करके वे फिर महर्षि वाल्मीकि कहलाए।
महर्षि
वाल्मीकि के जीवन से हम क्या सीखें
महर्षि
वाल्मीकि जी का जीवन परिवर्तनों से भरा हुआ है। आम आदमी यह कल्पना भी नहीं कर सकता
कि लूटपाट करने वाला कोई डाकू भी इस तरह किसी दिन रामायण जैसे महान ग्रंथ की रचना
कर सकता है।महर्षि वाल्मीकि का जीवन लोगों को प्रेरणा से भर देता है।उनके जीवन से
यह बात प्रमाणित होती है कि बुरा से बुरा जीवन बिताने वाला भी अपनी इच्छाशक्ति से
एक दिन अपने जीवन को आमूल चूल बदल सकता है।जीवन को सुंदर सहज और लोकप्रिय बना सकता
है।
रामायण का जीवन में महत्व. Ramayan ka Jivan men Mahatva

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